सेवा, समर्पण और त्याग की मूर्ति चंदनसिंह परिहार का अलंकरण समारोह

 

“राजपूत रत्न चंदनसिंह परिहार – सेवा और शौर्य की अद्भुत मिसाल”

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राजपूती परंपरा केवल तलवार के दम पर लड़ी गई लड़ाइयों की कहानी नहीं है

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यह त्याग, सेवा, साहस और समाज उत्थान का भी इतिहास है

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विजयसिंह ठाकुर की नर्मदा केसरी के लिए विशेष रिपोर्ट

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इसी गौरवमयी धारा में एक और स्वर्णाक्षर जुड़ गया — जब डोलरिया के वरिष्ठ समाजसेवी चंदनसिंह परिहार को राजपूत रत्न – 2024 सम्मान से अलंकृत किया गया।

रविवार का दिन, डोलरिया के महाराणा प्रताप कॉम्प्लेक्स में भव्य दृश्य लेकर आया। महाराणा प्रताप की 11.5 फीट ऊँची अश्वारोही प्रतिमा के समक्ष, जयकारों की गूंज और समाज की महिला शक्ति की गरिमामयी उपस्थिति में, परिहार साहब को शॉल, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

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यह सम्मान जय राजपूत समाज सेवा समिति की ओर से उन व्यक्तित्वों को दिया जाता है जो समाज सुधार, विकास और जागरूकता के क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं, और समाज को नई दिशा देने का संकल्प लेकर आगे बढ़ते हैं।

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समिति के सचिव संजयसिंह राजपूत के अनुसार, यह सम्मान प्रतिवर्ष युवक-युवती परिचय सम्मेलन की पत्रिका “परिणय-चयनिका” के विमोचन अवसर पर घोषित किया जाता है।

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पूर्व में यह गौरव वरिष्ठ पत्रकार अशोक सिंह जादौन,

आर्किटेक्ट मोहित सोलंकी,

नपाध्यक्ष पुष्पाविजय राजपूत,

एशियाड कांस्य पदक विजेता हर्षिता तोमर

और

सीए मुकेश सिंह राजपूत

जैसे विशिष्ट व्यक्तित्वों को मिल चुका है।

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कार्यक्रम का दृश्य मानो राजपूती परंपरा का जीवंत चित्र था —

महिलाओं की शालीन उपस्थिति, पुरुषों का उत्साह, संघटन की गरिमा और शौर्य की भावना से ओत-प्रोत वातावरण।

करुणा भगत सिंह भदौरिया, कामिनी प्रमोद सिंह राजपूत, मुक्ता मनोज सिंह राजपूत, मोहिनी दिगपाल सिंह राजपूत,

रीना सत्यनारायण परिहार, शिवानी राजपूत, राजेश्वरी परिहार, महक राजपूत सहित बड़ी संख्या में महिला शक्ति ने इस सम्मान समारोह को चार चाँद लगा दिए।

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साथ ही मनमोहन सिंह पटेल, गुलाब चौहान, मनीष ठाकुर, योगेंद्र राजपूत, महेंद्र भदौरिया, विश्वनाथ चंदेल, प्रमोद बुंदेला, राजेंद्र बुंदेला, दीपेंद्र भदौरिया, हेमेंद्र पटेल, और अनेक समाजबंधुओं की उपस्थिति ने इस अवसर को ऐतिहासिक बना दिया।

विजयसिंह ठाकुरविजयसिंह ठाकुर

राजपूत समाज के लिए यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का गौरव नहीं, बल्कि यह पूरी जाति की सेवा, साहस और एकता का प्रतीक है।

चंदनसिंह परिहार का यह अलंकरण आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि राजपूती शौर्य केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि समाज निर्माण की हर उस राह पर चमकता है जहाँ निस्वार्थ सेवा, त्याग और आदर्शों का पालन होता है।

जय राजपूत, जय सेवा, जय शौर्य!

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