“भवन कब टूटेगा ?” सवाल यह है — “प्रशासन की नींद कब खुलेगी .. ?”

 

शिक्षा व्यवस्था की नींव हिलती ज़रूर है, लेकिन सुधरती नहीं : कब जागेगा प्रशासन … ?

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घटना के बाद नहीं, घटना के पहले लापरवाही तय हो अधिकारियों की 

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सिवनी मालवा तहसील के हरसूल गांव में स्थित शासकीय प्राथमिक शाला की स्थिति आज एक भयावह खतरे का संकेत बन चुकी है। जहां ज्ञान का मंदिर होना चाहिए, वहां जर्जर दीवारें, टपकती छत और गिरता प्लास्टर बच्चों की सुरक्षा पर सीधा प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। यह केवल हरसूल की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे सिवनी मालवा विकासखंड की उन 39 शालाओं की दास्तान है जो समय के साथ-साथ खंडहर बन चुकी हैं, लेकिन फिर भी उनमें बच्चों को बैठाकर “शिक्षा” दी जा रही है।

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लापरवाही बनाम जिम्मेदारी

हरसूल की प्राथमिक शाला में 1 से 5वीं कक्षा तक कुल 18 बच्चे पढ़ते हैं। स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन दिए जा चुके हैं, शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। यह वह वर्ग है जो देश का भविष्य है – लेकिन जब नींव ही दरक रही हो तो भविष्य किस आधार पर मजबूत होगा?

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शिक्षक भी मजबूरी में इस खतरे से भरे भवन में पढ़ा रहे हैं। अभिभावक डरते हैं कि कहीं कोई हादसा न हो जाए। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, जिससे बाद में “जांच” बैठा दी जाए और कुछ “मुआवजा” देकर बात खत्म कर दी जाए?

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विभाग की प्रतिक्रिया : कागजों में संवेदना

बीआरसीसी संगीता यादव द्वारा बताया गया कि शाला भवन को तोड़ने का प्रस्ताव भेजा जा चुका है और स्वीकृति मिलते ही कार्रवाई की जाएगी। यह कथन उस ‘दफ्तरशाही प्रक्रिया’ की एक और मिसाल है, जहां ‘प्रस्ताव’ सालों तक फाइलों में धूल खाते हैं और ज़मीनी हकीकत वहीं की वहीं पड़ी रहती है।

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ग्राम बटकी और बावडिया भाऊ की शालाएं इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जिनके भवन तो तोड़ दिए गए, लेकिन वैकल्पिक भवन की कोई योजना नहीं बनी। नतीजतन, वहां की शालाएं भवनविहीन हो चुकी हैं।

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राजनीतिक उदासीनता

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। चुनावी मंचों पर शिक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं की नजर शायद अब इस “गांव की शाला” पर नहीं जाती। उनके लिए प्राथमिक शिक्षा एक चुनावी वादा है, जो सिर्फ घोषणा पत्रों में ही जीवित रहता है।

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प्रश्न जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए:

@ क्या प्रशासन को इस बात की जानकारी नहीं कि ये भवन बच्चों की जान के लिए खतरा हैं?

@ प्रस्ताव भेजने के दो साल बाद भी स्वीकृति क्यों नहीं मिली?

@ क्या इन बच्चों को सुरक्षित स्थान पर शिक्षा देने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती थी?

@ कब होगी लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई?

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समाधान की दिशा में आवश्यक कदम जरूरी

1. आपातकालीन निरीक्षण और रिपोर्टिंग: सभी जर्जर शालाओं की तत्काल जांच कर सूची सार्वजनिक की जाए।

2. वैकल्पिक शिक्षा स्थल: जब तक नया भवन नहीं बनता, तब तक निकटस्थ सामुदायिक भवनों या पंचायत भवनों में शालाएं चलाई जाएं।

3. नागरिक सहभागिता: जनसुनवाई कार्यक्रमों में ऐसी शिकायतों को प्रमुखता दी जाए और समाधान की समय सीमा तय की जाए।

4. जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही: हर विधानसभा क्षेत्र के विधायक से यह पूछा जाए कि उनके क्षेत्र की कितनी शालाएं भवनविहीन हैं और वे स्वयं इसके लिए क्या प्रयास कर रहे हैं।

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देश के भविष्य के लिए हमारा सात्विक चिंतन

शिक्षा का अधिकार केवल एक संवैधानिक वाक्य नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चों के लिए एक सुरक्षित, सम्मानजनक और व्यवहारिक अनुभव होना चाहिए। जब तक राजनेता, अधिकारी और समाज इस विषय को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक जर्जर दीवारों के नीचे सिर्फ प्लास्टर ही नहीं गिरेगा — गिरेंगे हमारे बच्चों के सपने, उम्मीदें और संभावनाएं भी।

अब सवाल यह नहीं कि “भवन कब टूटेगा ?” सवाल यह है — “प्रशासन की नींद कब खुलेगी .. ?”

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