❝खाद संकट के बहाने उजागर होती राजनीतिक और प्रशासनिक अव्यवस्था❞
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नगर कांग्रेस कमेटी ने ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री के पुतला दहन की चेतावनी दी
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सिवनी मालवा क्षेत्र में इन दिनों जो खाद की किल्लत सामने आ रही है, वह केवल कृषि संकट का एक पक्ष नहीं, बल्कि राजनीतिक चुप्पी, प्रशासनिक लापरवाही और सुनियोजित शोषण का आईना है। जहां एक ओर किसान बरसात के इस खरीफ सीजन में समय पर बोवनी और अन्य कृषि कार्यों के लिए उर्वरक के लिए भटक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी गोदाम खाली पड़े हैं और प्राइवेट विक्रेता महंगे दामों पर खाद बेच रहे हैं। यह परिदृश्य अपने आप में एक गहरी साजिश और सत्ता के असंवेदनशील रवैये की गवाही देता है।
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❖ असंतुलित आपूर्ति और खोखली योजनाएँ
कांग्रेस द्वारा दिए गए ज्ञापन में जिस असंतुलन की बात कही गई है, वह कोई नया विषय नहीं है। वर्ष दर वर्ष किसानों को खाद, बीज और कीटनाशकों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति तब और त्रासद बन जाती है, जब वितरण प्रणाली में पारदर्शिता का अभाव हो और टोकन सिस्टम केवल एक दिखावा बनकर रह जाए। ऐसे में किसान के पास दो ही रास्ते बचते हैं – या तो वह कालाबाजारी से ऊंचे दामों पर खाद खरीदे या फिर अपने खेत को बंजर छोड़ दे।
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❖ कालाबाजारी को प्रश्रय देने वाली व्यवस्था
कई स्थानों से खाद की कालाबाजारी की शिकायतें सामने आ रही हैं। यह कोई छुपा हुआ अपराध नहीं, बल्कि सरेआम चलने वाला वह व्यापार है, जो अफसरशाही की चुप्पी और राजनीतिक संरक्षण से पनपता है। अगर प्रशासन सजग होता और वितरण केंद्रों पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाती, तो शायद यह स्थिति न बनती।
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❖ विपक्ष की चेतावनी और सत्ता की चुप्पी
नगर कांग्रेस कमेटी द्वारा दिया गया ज्ञापन केवल शिकायत नहीं, बल्कि आने वाले आंदोलन की प्रस्तावना है। कार्यकर्ताओं की उपस्थिति और मुख्यमंत्री के पुतला दहन की चेतावनी यह दर्शाती है कि अब मामला केवल खाद की उपलब्धता का नहीं, बल्कि किसानों की सहनशीलता की अंतिम सीमा का है। इसके बावजूद, यदि शासन प्रशासन मौन बना रहता है, तो यह लोकतंत्र की असफलता मानी जाएगी।
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❖ प्रश्न जो शासन से पूछे जाने चाहिए
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1. सरकारी गोदाम खाली क्यों हैं, जब खाद की मांग चरम पर है?
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2. टोकन वितरण प्रणाली में पारदर्शिता क्यों नहीं है?
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3. प्राइवेट दुकानदारों को महंगी दर पर बिक्री की छूट किसने दी?
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4. प्रशासनिक निगरानी और जबावदेही कहाँ है?
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5. क्या यह खाद संकट जानबूझकर रचा गया है, जिससे कुछ मुनाफाखोरों को लाभ पहुँचे?
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❖ संकट नहीं, सुनियोजित लापरवाही
यह खाद की किल्लत किसी प्राकृतिक आपदा या आकस्मिक आपूर्ति बाधा का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित राजनीतिक-प्रशासनिक लापरवाही का दुष्परिणाम है। यह एक ऐसी परिस्थिति है, जहाँ गरीब और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, और वहीं से जन आक्रोश की चिंगारी भी उठती है।
समय आ गया है कि शासन प्रशासन चेत जाए, अन्यथा किसानों के इस आक्रोश की लहर किसी बड़ी आंदोलनात्मक शक्ति में परिवर्तित हो सकती है।









