किसानों के धैर्य की परीक्षा : लापरवाही की पराकाष्ठा बनता प्रशासन
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भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव ग्रामीण भारत है, और ग्रामीण भारत की आत्मा किसान। परंतु जब वही किसान, जो राष्ट्र का अन्नदाता है, प्रशासनिक लापरवाहियों और सरकारी उदासीनता का शिकार बनता है, तब केवल उसकी आजीविका ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास भी संकट में पड़ता है। सिवनी मालवा में 71 किसानों के भुगतान पत्रक अटकने और उसके पश्चात उपजे जनाक्रोश की यह घटना, प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
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प्रशासनिक चूक या सोची-समझी अनदेखी…?
मां शारदा वेयरहाउस को जांच टीम द्वारा सील कर देना, एक प्रशासनिक कदम हो सकता है, लेकिन इस कार्रवाई का प्रतिकूल प्रभाव 71 किसानों पर पड़ा, जिनके भुगतान पत्रक अब तक नहीं बन पाए। इसके चलते उपार्जन की प्रक्रिया भी बीच में ही रुक गई। किसानों का आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी या तो अनुपलब्ध हैं या टालमटोल कर रहे हैं। जब भुगतान पत्रक बनाने की अंतिम तिथि भी निकल गई, तब यह प्रश्न उठता है कि – क्या अधिकारियों ने संकट की गंभीरता को समय रहते नहीं समझा, या फिर किसानों की व्यथा उनकी प्राथमिकता में नहीं है..?
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प्रशासन से विश्वास उठता
23 जुलाई 2025 को जब लगभग 50 किसान नर्मदापुरम कलेक्टर से मिलने पहुंचे, तो सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक इंतजार के बावजूद कलेक्टर ने उनसे भेंट नहीं की। यह उस प्रशासन का चेहरा है जो जनसेवा का दावा करता है। फोन नहीं उठाना, संवाद से बचना, और फिर अपर कलेक्टर से औपचारिक चर्चा कर पल्ला झाड़ लेना – ये सभी घटनाएं बताती हैं कि किसानों की समस्या को प्राथमिकता नहीं दी गई।
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सूची का खेल बनाम समाधान की मां
किसानों के अनुसार, अब तक केवल “सूचियाँ” बनाई जा रही हैं – पीड़ित किसानों के नाम एक टेबल से दूसरी टेबल भेजे जा रहे हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कोई भी स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आई है। ऐसे में यह संदेह स्वाभाविक है कि कहीं यह समस्या को टालने की रणनीति तो नहीं?
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राजनीतिक प्रतिक्रिया और संघर्ष का संकेत
भारतीय किसान यूनियन ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर 5 अगस्त तक समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो विधायक और कलेक्टर का पुतला दहन किया जाएगा। यह कदम केवल प्रशासन के प्रति आक्रोश नहीं दर्शाता, बल्कि यह उस व्यवस्था पर अविश्वास भी है जो जनता की समस्याओं पर गंभीरता नहीं दिखाती। यह आंदोलन राजनीतिक चेतावनी भी है – अगर निर्वाचित प्रतिनिधि और अधिकारी जनहित की उपेक्षा करेंगे, तो जनविरोध भी स्वाभाविक है।

यह संपूर्ण प्रकरण एक बड़े प्रशासनिक संकट की ओर इशारा करता है – जहां जमीनी स्तर की समस्याएं कागज़ी कार्यवाही में उलझ जाती हैं, और पीड़ित वर्ग लगातार दफ्तरों के चक्कर काटता रह जाता है। किसानों के धैर्य की परीक्षा अब ज्यादा लंबी नहीं होनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि तत्काल हस्तक्षेप कर किसानों को राहत प्रदान करे, अन्यथा, पगढाल टोल नाके पर होने वाला प्रतीकात्मक पुतला दहन, भविष्य में एक बड़े जनांदोलन की चिंगारी बन सकता है।








