पितृपक्ष और चंद्रग्रहण का महत्व : धार्मिक परंपराओं व कर्मकांड का संदेश
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रविवार दोपहर 1.57 बजे से सूतक चंद्र ग्रहण रात 9.57 बजे से प्रारंभ होकर 1.27 बजे मोक्ष
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इसी दिन से पितृपक्ष का शुभारंभ भी हो रहा : आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व
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नर्मदा केसरी के लिए विजय सिंह ठाकुर की विशेष रिपोर्ट
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रविवार की रात लगने वाला चंद्रग्रहण धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह ग्रहण रात 9.57 बजे से प्रारंभ होकर 1.27 बजे मोक्ष को प्राप्त होगा। ग्रहण के कारण रविवार दोपहर 1.57 बजे से सूतक लग जाएगा, जिसके चलते नगर के मंदिरों के पट दोपहर 12.50 बजे से बंद कर दिए जाएंगे। सोमवार तड़के ग्रहण स्नान उपरांत मंदिरों के पट पुनः खुलेंगे और सामान्य पूजन-अर्चन प्रारंभ होगा।
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इसी दिन से पितृपक्ष का शुभारंभ भी हो रहा है। पितृपक्ष हिंदू समाज की आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें अपने पूर्वजों को स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। मान्यता है कि इन दिनों में पितरों का आशीर्वाद लेने से परिवार में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहती है।
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क्यों महत्वपूर्ण है पितृपक्ष
मानव जीवन में पितृपक्ष केवल कर्मकांड भर नहीं है, बल्कि यह हमारे संस्कारों और कर्तव्यों की याद दिलाने वाला अवसर है। माता-पिता और पूर्वजों के ऋण से कोई भी मुक्त नहीं हो सकता। उनका स्मरण, तर्पण और श्राद्ध हमें उनके द्वारा दिए गए मूल्यों, संस्कारों और परंपराओं को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है। यह हमारे परिवार को जोड़ने और पीढ़ियों के बीच भावनात्मक सेतु का कार्य करता है।
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विद्वानों के अनुसार
🥀श्राद्ध करते समय सुबह स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
🥀घर के ईशान कोण में बैठकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करें।
🥀एक ताम्र पात्र में जल, काले तिल, कुश और पुष्प डालकर सूर्य को अर्घ्य दें।
🥀इसके बाद तिल, गंगाजल और दूध मिश्रित जल से पितरों का तर्पण करें और उनसे आशीर्वाद की प्रार्थना करें।
🥀अंत में ब्राह्मण, गरीब और पशु-पक्षियों को भोजन कराना सर्वोत्तम माना गया है।
अपने पंडितज जी से परामर्श अवश्य करें
चंद्रग्रहण के उपलक्ष्य में सोमवार प्रातः नर्मदा नदी सहित अन्य घाटों पर स्नान की विशेष व्यवस्था की गई है। किंतु इस समय नर्मदा का प्रवाह तीव्र है तथा तवा और बरगी बांध के खुले गेटों से जलस्तर बढ़ा हुआ है। अतः प्रशासन ने श्रद्धालुओं से सावधानी बरतने की अपील की है।
जीवन में संदेश
पितृपक्ष हमें यह सिखाता है कि केवल कर्मकांड ही नहीं, बल्कि अपने आचरण, सेवा, आदर और संस्कारों के पालन से ही हम सच्चे अर्थों में पितृ ऋण से मुक्त हो सकते हैं। पूर्वजों का स्मरण करना, उनके उपदेशों पर चलना और परिवार व समाज के कल्याण के लिए कार्य करना ही इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य है।









